काव्य मंजूषा

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शुक्रवार, 5 मार्च 2021

इन्क़िलाब

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चेहरे पे ओढ़े रखता हूँ चादर शीरीन मुस्कान की जो दिल की लिखूँगा तो इन्क़िलाब लिखूँगा ख़ामोशी का ही पहरा रहता है मेरे ज़हन में अक़्सर पन्नों पर फटू...
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