"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

हाथरस



कठुआ, उन्नाव, हाथरस
छाया सघन घोर तमस
स्त्री-जीवन हर ओर पीड़ित
चोटिल देह प्राण कुपित

न कोई सुनवाई, न कोई पेशी
फिर रही वो लिए
टूटी रीढ़ व जीभ कटी
फेंक दी जाती सरेआम अधनंगी लाश
न हो रहा दोषियों को कारावास

नाकामी छुपा ली खाकी ने अपनी
करके बच्ची का जबर संस्कार
पर बेहद दुःखद है ख़त्म न हो रहा 
उद्दंड पुरुष का यह विकार

दोहराया जा रहा अलबत्ता फिर वही एक बार
लिख रहे कवि छंद और उत्कृष्ट अलंकार
कड़ी निंदा से भर गए अख़बार
सोशल मीडिया पर लग गया हैशटैग का अंबार

होगी न्यूज़रूम से खोखली हुंकार
'हैंग द रेपिस्ट्स' की लगेगी निष्फल गुहार
कानून-व्यवस्था कटघरे में होगी फिर एक बार
होगा तर्क-वितर्क, मीमांसा, सत्य-असत्य पर विचार

सब सो जाएंगे पुनः कुम्भकर्ण की नींद
तब तक जब तक फिर न ऐसा कुछ घटे 
किसी का सर न कटे, किसी का माथा न फटे
सब हो जाएगा सामान्य यूँ ही हर बार
सिलसिलेवार लगातार बारंबार

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बेहद स्पष्ट शब्दों में एक एक सच उजागर किया ।

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    1. जी हाँ, ऐसा ही होता है हर बार। जब भी ऐसा कोई जघन्य अपराध होता है, चारों तरफ़ शोर शराबा हो-हल्ला शुरू हो जाता है जो महज़ चार दिनों तक रहता है। उसके बाद लोग फ़िर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते हैं, तब तक जब तक फ़िर किसी घर की बेटी-बहु की आबरू पर आंच न आये। इस एक पद्धति में चलने वाली क्रिया में हम-आप भी शामिल हैं। इस विकृति के सामने अपना नाकारापन काटने को दौड़ता है...देश की कानून व्यवस्था, न्याय प्रणाली सब लाचार से हैं इसके सामने, जाने कब छुटकारा मिले इससे

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