"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली
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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

चलो आज रंगों की बात करें

 


चलो आज रंगों की बात करें
ढोल ताशे मृदंग बाजे
प्रकृति मोहक सिंगार साजे
महकी फ़िज़ाओं में प्यार पले
चलो आज खुशरंगों की बात करें

अड़चन छोड़ युक्ति सोचें
पतझड़ बीते वसंत झूमे
दिल में एक नया उमंग भरें
चलो आज रोशनी की बात करें

घृणा नहीं प्रेम दें
उर में देवाकृति उकेर दें
सबसे गले मिल
चलो अब मेल-मिलाप करें
चलो आज रंगों की बात करें

दुःस्वप्न भूल मृदु-स्वप्न जियें
कुंठा व म्लान त्याग,
चलो उत्सवों की बात करें
मौत पसरा हो भले ही क्यूँ न
चलो आज ज़िंदगी की बात करें
चलो आज रंगों की बात करें

रंग-गुलाल-सा जीवन खिले
काँटे नहीं गुलाब मिलें
मरु पे सहसा दूब उगे
आओ पुनः फूंक आशाओं की भरें
चलो आज रंगों की बात करें

हम मन-मलंग हों
निखरा हरेक अंग हो
हर रोज़ नूतन शिखर छूएं
चलो आज बुंलदियों की बात करें
चलो आज रंगों की बात करें

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

इन्क़िलाब


चेहरे पे ओढ़े रखता हूँ चादर शीरीन मुस्कान की
जो दिल की लिखूँगा तो इन्क़िलाब लिखूँगा

ख़ामोशी का ही पहरा रहता है मेरे ज़हन में अक़्सर

पन्नों पर फटूँगा तो सैलाब लिखूँगा

दुनियां की इस मोह-माया से यूँ तो परे हूँ

ग़र जो बन पाया तो अपने महबूब का इंतिख़ाब बनूँगा

हक़ीक़त में ही जीना पसंद है मुझे पर

कल कैसा हो जो कोई पूछे तो मैं अपना ख़्वाब लिखूँगा

तुम दुश्मन भले हो मेरे, लाख नफ़रत सही

किसी गली,किसी चौक पर मिले तो मैं तुम्हें गुलाब दूँगा

हर ग़ज़ल हर नज़्म वतन के नाम करूँ मैं
जहाँ कहीं भी रहूँ, मैं अपनी मिट्टी से प्यार बेहिसाब करूँगा

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

कठपुतली



इंसान यूँ तो है ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना
पर है उसे व्यर्थ ही समय नष्ट करना
अपने भवितव्य से अनजान
रहे सदा व्याकुल, न पावे त्राण

करके जल्द सारे पड़ावों को पार
शीघ्र ही करना उसे भवसागर पार
हड़बड़ी में जाता जीना भूल
फ़िर वैकुंठ की तैयारी में रहता मशगूल

एक बित्ता जमीन हथियाने पापी जाल बुने
अंततः सब पीछे छोड़ खाली हाथ चले
वह मूढ़, तनिक ये न समझे
पृथ्वी जीतने बड़े-बड़े तुर्रमखां आये
पृथ्वी वहीं है, वे अतुल व्योम में चले गये

शांति हेतु परिजन को दूर-सुदूर करे
अशांत ही परलोक की ओर कूच करे
जीवन-भर जिस निजता का पाठ पढ़ें
वही निज-जन खड़ी उनकी खाट करें

सुख-साधन के पीछे सारा जीवन खपाय
अंततः माटी का शरीर माटी में मिल जाय
कुछ बनने की ज़िद में सारी उमर बिताय
रहेगा कठपुतली ही, न हो कदाचित् व्यग्र हाय!

कौन समझाए? ये संसार है तो बस
ईश्वर की रचनात्मकता का नमूना, जैसे
मैं लिखूँ कविता, तुम बनाओ कलाकृतियाँ
बढ़ई बनाये फर्नीचर, कुम्हार बनाये मूर्तियाँ
ठीक वैसे, है विधाता ने ये संसार बनाया
अपनी सृजनात्मकता का है मिसाल दिया

इस दुनिया का और कोई गूढ़ रहस्य नहीं
तुम्हारे आने का कोई विशेष उपलक्ष्य नहीं
सफल हो या निष्फल रहो
तुम तो बस सद्कर्म करो

चार दिन की है ज़िन्दगी
अनंत असीम अपरिमित जियो
मुकुलित मुदित तरंगित जियो
मुकुलित मुदित तरंगित जियो


शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो

कब तक सुनोगे दूसरों की
कभी अपने दिल की सुन के तो देखो
क्या हुआ गर नहीं है कोई रहबर तुम्हारा
ख़ुद पर यकीन कर रहगुज़र ढूंढ के तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


दुनिया बड़ी ही हसीन है
कभी प्यार से बाहें फैला कर तो देखो
सब के दिलों पर राज करोगे
नकाबपोश चेहरे से नकाब हटाकर तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


क्या हुआ गर सारे सुर पक्के नहीं तुम्हारे
कभी कोई साज़ छेड़कर तो देखो
क्या पता नायाब नगीना हाथ लग जाए तुम्हारे
कभी यूँ ही सैर पर निकल कर तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


ज़हर घोलने वाले बहुतेरे हैं इस जहाँ में
कभी मीठे बोल की चासनी घोल के तो देखो
सब के सब दिल दुखाने में माहिर हैं
कभी किसी के ज़ख्म पर मरहम लगा के तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


नहीं होते हर किसी के पिचहत्तर आशिक
किसी के दिल के कोरे पन्नों पर दस्तखत कर के तो देखो
ताउम्र रहेंगे तुम्हारे शुक्रगुज़ार
कभी किसी की ज़िन्दगी बयाबान से बागबान कर के तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


अब न जियोगे हिज्र में तुम, जल्द आएगी वस्ल की रात
इश्क़-ए-हयात में सरगम एक बार फिर गुनगुना के तो देखो
और न करना पड़ेगा इंतज़ार ए मुन्तज़िर
ताक़-ए-दिल में किसी और का चेहरा बसाकर तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम



यही तुम्हारा सत्य है जो मान लो तुम 
तुम्हें खुद से क्या चाहिये, जो ये जान लो तुम
किन बुलंदियों को छू लोगे इसका तुम्हें अंदाज़ा नहीं
इन बेड़ियों को अगर तोड़ दो तुम
चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम 

अकेले में अगर नंगा हो सको तुम
तन-मन के काले दाग जो देख सको तुम 
छुपना- छुपाना, उघारना-ढांपना से दूर
नग्नता में अपनी सच्चाई जो देख सको तुम
चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम 

किसी की न सुनकर जो दिल की सुनो तुम 
कोई गुरु, कोई संत नहीं 
सबकी छोड़ जो अपनी करो तुम 
सारे जग से भले बैरी हो जाओ तुम 
पर जो खुद के सच्चे दोस्त बन सको तुम 
चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम 

हालातों के मारे तो बहुतेरे हैं 
परिस्थितियों के विरुद्ध जो डटकर लड़ सको तुम 
हर किसी का रास्ता साफ नहीं होता 
भटक कर ही सही, मंज़िल तक का पथ जो ढूंढ सको तुम 
चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम 

खुशी है एक मृगतृष्णा

कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए जो है उसकी सुद नहीं, जो...