"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली
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शुक्रवार, 21 मई 2021

आदत हो जाने की आदत

 


इंसानों की एक खराब आदत है
हर चीज़ की आदत हो जाना
कुछ ठीक-ठाक वक़्त बीतने के बाद
एक चीज़ के साथ
चाहे वो एक स्थिति-परिस्थिति हो
या कम-ज़्यादा समय तक साथ रहने वाले इंसान हों
या फ़िर जीवन के अन्य छोटे-बड़े परिवर्तन
इंसान उसके साथ जीने का आदी हो जाता है
अब नहीं तो तब

यह सही भी है,
पर 
कुछ मौकों पर
यह उसे जीने का हौसला देती है
प्रतिकूल समय में

लेकिन,
जब बदतर से बदतरीन स्थिति हो चारों ओर
हलाहल के कड़वे घूँट पी रहे हों लोग
और मौत के घाट उतर रहे हों
तो 
आदमी ज़रा अपनी इस
"किसी भी चीज़ की आदत हो जाने की आदत" 
से परहेज़ करे

लाशों के साथ जीने का भी कहीं आदी न हो जाये
कहीं भाव-शून्य न हो जाय
और 
अपनी ज़िंदगी उसी बेपरवाही-बेफ़िक्री में 
उन्मत्त होकर न जिये
के जैसे सब सामान्य ही हो

जब दूसरे 
एक कुचक्र 
में फंसकर दम तोड़ रहे हों
तो "नैतिकता" तो यह है कि
मानस उनका मर्म जाने
अपनी आँखें आर्द्र करे
ऐसे जटिल समस्या का शीघ्र निदान हो,
ईश्वर से प्रार्थना करे
अपनी गति थोड़ी धीमी करे
और अपने हाथ-पैर समेट कर जिये

करुणा पैदा करे और
जीवित लोगों के काम आए 
दुखियारों का कष्ट हरे
उनके लिये एक उम्मीद की किरण बने
ठिठकते जीवन में चंद साँसें और जोड़े
कुछ अपनी कहे, ज़्यादा उनकी सुने
थोड़ा और मनुष्य बने
थोड़ा और मनुष्य बने

शुक्रवार, 14 मई 2021

प्रकृति का कर्ज़



खरीदा हुआ दाना
खरीदा हुआ पानी
खरीदा हुआ अनल-अनिल
खरीदी हुई धरणी

 
इस उधार की ज़िंदगी में
बड़ी खरीदारी कर ली हमने
इस भ्रम में कि
प्रकृति के कर्ज़ से उऋण हो जाएंगे


मगर इस संभ्रम में
सभी वित्तीय कोष 
या तो खाली हो गये या
खाली होने के कगार पर हैं
और
हम कर्ज़दार के कर्ज़दार रह गये

शुक्रवार, 7 मई 2021

दंगा

 


जब कोई दंगा होता है
तो कहर बरपता है
अनगिनत मौतें होती हैं
ज़िंदगियाँ पायमाल हो जाती हैं
और उन सारी मौतों का हिसाब
महज़ आँकड़ों से नहीं लगाया जा सकता
मेरे तुम्हारे लिए होगी एक सुर्खी
या सुर्खियों में बताई गई सिर्फ़ एक संख्या

ज़रा उन मांओं से पूछो जिनकी गोद उजड़ गई
वो दर्द मिला जिसकी कोई दवा नहीं
उन दुल्हनों से पूछो जिनके दूल्हे शादी की अगली सुबह ही 
मौत की गहरी नींद में सो गए
हाथों की मेंहदी देख रो-रोकर होती है रात,
होता है दिन
उन मासूम बच्चों से पूछो जिनके सर से बाप का साया छिन गया
तमाम उम्र के लिये उनके हिस्से पिता-प्रेम नहीं आ पाया

हुक्मरानों को नहीं मालूम "दंगों की पीड़" क्या होती है
किसी अपने की मौत का ग़म क्या होता है
एक ग़लत हुक्म नहीं लिखते सिर्फ़
साथ ही एक तबाही का फ़रमान भी ज़ारी कर दिया जाता है
बहुत भारी तबाही
हर जली-टूटी दीवार चीख-चीखकर इस बात का
सबूत दे रही होती है
के उस रात क्या गुज़री

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

पारस्परिक प्रेम

 


तन यहाँ मन कहाँ-कहाँ
प्रेम बिनु पंछी खिड़े जहाँ-तहाँ
वो विवाहित या विवाहिता
जिसके हिस्से
प्रेम नहीं पड़ता
बड़े अभागे कहलाते हैं

यह और भी हृदय का शूल
साबित होता है जब
जोड़े में से कोई एक
कलुषित प्रेम में उद्भ्रांत हो

वंश के विस्तार हेतु किया गया
बिस्तर वाला कर्तव्यबद्ध-प्रेम
या कामुकता की नैसर्गिक तृष्णा शांत करने हेतु
की गई उत्साहित यौन-क्रीड़ा 
एक शरीरिक संबंध तो स्थापित कर सकता है
प्रेम नहीं

प्रेम की वास्तविक अनुभूति
किसी छुअन का मोहताज नहीं
किसी की स्नेहिल आँखों को देखकर भी
एक सात्विक प्रेम की नींव रखी जा सकती है

दो लोगों के परिणय में
पारस्परिक प्रेम की गुंजाइश हमेशा हो सकती है
इसे समझौता हमने ही बनाया है
==========================================

कलुषित- अपवित्र, निंदित
उद्भ्रांत- भटका हुआ, गुमराह 
नैसर्गिक- स्वाभाविक, प्राकृतिक 

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

मसान की भट्ठी

 

मौत आई तो किसी की एक न चली
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम,
सबकी जान पर बनी
अस्थि-पंजर सब राख हो गए
कि चिता जल कर ख़ाक हो गई
गिर रहीं अनगिनत लाशें रोज़ाना
कैसी जानलेवा ये आग फैल गई

मसान की भट्ठी भी नहीं है शांत
न तो क़ब्र की खुदाई ही रुक रही
रुदन-क्रंदन के स्वर हैं कानों में पहरों-पहर गूँजते
ये बेहिसाब मौतें बस 
झूठे आँकड़ों में सिमट कर रह गईं

ये क़ौमी "जुलूस-ताजिये" निकालना छोड़ दो
के मौत मज़हब नहीं देखती
एक दूसरे की बस ख़ैर मांगो
के ज़िन्दगी में और बड़ी तलब नहीं होती
जो बन सको तो एक-दूजे का "ऑक्सीजन" बनो
ज़हर तो हवा में भी घुल चुकी है
इसकी हरगिज़ कमी नहीं

सरकारों का क्या, आयेंगी जायेंगी
कुर्सी ही उनका सर्वस्व है,
वो तो उसे ही बचायेगी
तुम अपनी मांगें सही रखो
"मंदिर-मस्जिद" काफ़ी हैं,
पाठशाला-अस्पताल मांगो
ऊपरवाला खूब महफ़ूज़ है,
तुम अपनी ख़ैर तो सोचो

प्रजा सबल बनो जो गद्दी का ख़ौफ़ न करे
प्रजा सजग  बनो जो अपनी मांग सही रखे
वरना
"राजा राम" नहीं जो बिन कहे कष्ट हर लें
"राजा राम" नहीं जो बिन कहे कष्ट हर लें

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

त्रासदी



आग लगी, भगदड़ मची, शोर हुआ
सब एक-दूसरे को धक्का दे भागने लगे आयें-बांयें
सारे उस धधकती आग के डर से चीखने-पुकारने लगे
कुछ तो आनन-फानन में खिड़की से ही कूदने लगे
तो कुछ उस जानलेवा आग की लपटों में झुलसने लगे
और अंततः मौत की भेंट चढ़ गए
जब कोई आपदा आती है तब बुद्धि किसकी काम करती है भला
और दूसरे लोग तो बस तमाशबीन
स्मार्टफोन निकाला और लगे वीडियो बनाने
सारी मानसिकता व नैतिकता रख दी है ताख पर
जाने कौन-सी आग की लपटों का शिकार हो गई है मनुष्यता
बहुत भारी त्रासदी है ये हमारी 'टेक-सैवी' पीढ़ी का
मानो या ना मानो!!!

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

तरक्की

 


इंसान तरक्की कर रहा है
आधुनिक युग का इंसान खूब तरक्की कर रहा है
दिन दुगुनी रात चौगुनी कर रहा है
हो भी क्यूँ न!
उन्नत प्रौद्योगिकी युग है
घंटों का काम मिनटों में संभव है
अभियांत्रिकी की देन है यह अद्भुत क्रांति
पैसा इफ़रात है,
और अर्जित करने में लगा हुआ है आदमी
मंहगाई जो सीमाएं लांघ रही है
पर धनोपार्जन की इस अंधी दौड़ में
ये इंसान अत्यंत खालीपन व रिक्तता से गुज़र रहा है
भावनाओं का खालीपन और रिश्तों में रिक्तता
इंसान यहाँ भी अप्रतीम तरक्की कर रहा है
दिन दुगुनी रात चौगुनी कर रहा है
समझ नहीं आता!
इसे इंसान का उत्थान कहें या पतन?

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

चलो आज रंगों की बात करें

 


चलो आज रंगों की बात करें
ढोल ताशे मृदंग बाजे
प्रकृति मोहक सिंगार साजे
महकी फ़िज़ाओं में प्यार पले
चलो आज खुशरंगों की बात करें

अड़चन छोड़ युक्ति सोचें
पतझड़ बीते वसंत झूमे
दिल में एक नया उमंग भरें
चलो आज रोशनी की बात करें

घृणा नहीं प्रेम दें
उर में देवाकृति उकेर दें
सबसे गले मिल
चलो अब मेल-मिलाप करें
चलो आज रंगों की बात करें

दुःस्वप्न भूल मृदु-स्वप्न जियें
कुंठा व म्लान त्याग,
चलो उत्सवों की बात करें
मौत पसरा हो भले ही क्यूँ न
चलो आज ज़िंदगी की बात करें
चलो आज रंगों की बात करें

रंग-गुलाल-सा जीवन खिले
काँटे नहीं गुलाब मिलें
मरु पे सहसा दूब उगे
आओ पुनः फूंक आशाओं की भरें
चलो आज रंगों की बात करें

हम मन-मलंग हों
निखरा हरेक अंग हो
हर रोज़ नूतन शिखर छूएं
चलो आज बुंलदियों की बात करें
चलो आज रंगों की बात करें

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

धुँधली तस्वीर

कुछ तस्वीरें धुँधली-सी खिंच जाती हैं
जिन्हें लोग फ़िज़ूल समझकर फ़ोन 
अथवा 
कैमरे की मेमोरी से डिलीट कर देते हैं
एक परफ़ेक्ट तस्वीर खिंचने से पहले की
दर्जनों नाकामयाब कोशिशों का संकलन है ये धुँधली तस्वीरें
पर इन धुँधली तस्वीरों का अधूरापन ही मुझे भाता है
जाने क्यूँ ?
ये इम्परफ़ेक्ट तस्वीरें ही मुझे परफ़ेक्ट लगती हैं
ये अधिक सच्ची लगतीं हैं मुझे
इस धुँधलके में कहीं न कहीं व्यक्ति की वास्तविक मन:स्थिति का भान होता है
पूरी साफ़-सुथरी परफ़ेक्ट तस्वीरों में एक मिलावट-सी लगती है
जैसे दूध में पानी की मिलावट
कच्चे और पक्के फल की मिलावट
व्यक्ति अपने मूल भाव-दशा में नहीं रहता 
परफ़ेक्ट दिखने की होड़ में
चित्तवृत्ति पे ज्यूँ ओढ़ लिया हो एक छद्मपूर्ण आवरण
आत्मा ने ज्यूँ धारण कर ली हो एक भ्रामक काया

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

ये चुप्पी क्यूँ?

 

भरे बाज़ार हो जब किसी नारी का चीरहरण
हलधर त्यागे प्राण जब न पावे वाजिब दाम, 
दलहन हो या तिलहन
सेना की शहादत पर हो जब भरपूर राजनीतिकरण
गौ-रक्षा के नाम पे हो जब बेकसुरों का मरण
तब लाज़मी है पूछना के ये चुप्पी क्यूँ?

सत्ताविरोध पर जब लग जाए देशद्रोह का लांछन
चुनाव में बहे बेहिसाब पैसा जब करके राष्ट्रकोष-गबन
विकास के नाम पे हो जब 'फ़ेक न्यूज़' का वितरण
वोटों के लिए जब हो सरेआम खरीद-फ़रोख़्त का चलन
तब लाज़मी है पूछना के ये चुप्पी क्यूँ?

पप्पू, चोर व नीच जैसे अपशब्दों से जब भरा हो राजनैतिक भाषण
एक दल की पराजय हेतु जब बनने लग जाए 'महागठबंधन'
किसने किये कितने घोटाले, होने लगे जब इस बात का 'कॉम्पिटिशन'
टीवी चैनलों पर होने लगे जब निरा झूठ का प्रसारण
तब लाज़मी है पूछना के ये चुप्पी क्यूँ?

अर्थशास्त्री की बग़ैर सुने जब कर दिया जाए 'डीमोनिटाइजेशन'
संसद में आँख मारने या गले पड़ने का जब हो जाए चलन
लगातार बारंबार जब होने लगे मानवाधिकार हनन
'सत्तर साल' बाद भी जब शिक्षा व स्वास्थ्य का ना हो पाया हो सशक्तिकरण
तब लाज़मी है पूछना के ये चुप्पी क्यूँ?

जय श्री राम औ' चंडीपाठ से जब राजतंत्री करें सम्मोहन
अतिरिक्त विचारों का जब होने लगे सर्वस्व उन्मूलन
एमपी एमएलए की चोरी से हो जब विधिवत सरकार गठन
अमर्यादित मूल्य बढ़ोतरी से दूभर हो जाये जब भरण-पोषण
तब लाज़मी है पूछना के ये चुप्पी क्यूँ?

सड़क-पानी-बिजली-इंटरनेट छोड़ हो जब मंदिर-मस्जिद का उल्लेखन
सत्ता-लोलुप कभी बनें मोहम्डन तो कभी जनेऊधारी ब्राह्मण
वोट बैंक और सत्तालोभ वश जब भ्रष्टाचारियों व अतंकियों का हो नामांकन
देशभक्ति व राष्ट्रप्रेम की जब बदल दी जाए 'डेफिनिशन'
तब लाज़मी है पूछना के ये चुप्पी क्यूँ?

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

कठपुतली



इंसान यूँ तो है ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना
पर है उसे व्यर्थ ही समय नष्ट करना
अपने भवितव्य से अनजान
रहे सदा व्याकुल, न पावे त्राण

करके जल्द सारे पड़ावों को पार
शीघ्र ही करना उसे भवसागर पार
हड़बड़ी में जाता जीना भूल
फ़िर वैकुंठ की तैयारी में रहता मशगूल

एक बित्ता जमीन हथियाने पापी जाल बुने
अंततः सब पीछे छोड़ खाली हाथ चले
वह मूढ़, तनिक ये न समझे
पृथ्वी जीतने बड़े-बड़े तुर्रमखां आये
पृथ्वी वहीं है, वे अतुल व्योम में चले गये

शांति हेतु परिजन को दूर-सुदूर करे
अशांत ही परलोक की ओर कूच करे
जीवन-भर जिस निजता का पाठ पढ़ें
वही निज-जन खड़ी उनकी खाट करें

सुख-साधन के पीछे सारा जीवन खपाय
अंततः माटी का शरीर माटी में मिल जाय
कुछ बनने की ज़िद में सारी उमर बिताय
रहेगा कठपुतली ही, न हो कदाचित् व्यग्र हाय!

कौन समझाए? ये संसार है तो बस
ईश्वर की रचनात्मकता का नमूना, जैसे
मैं लिखूँ कविता, तुम बनाओ कलाकृतियाँ
बढ़ई बनाये फर्नीचर, कुम्हार बनाये मूर्तियाँ
ठीक वैसे, है विधाता ने ये संसार बनाया
अपनी सृजनात्मकता का है मिसाल दिया

इस दुनिया का और कोई गूढ़ रहस्य नहीं
तुम्हारे आने का कोई विशेष उपलक्ष्य नहीं
सफल हो या निष्फल रहो
तुम तो बस सद्कर्म करो

चार दिन की है ज़िन्दगी
अनंत असीम अपरिमित जियो
मुकुलित मुदित तरंगित जियो
मुकुलित मुदित तरंगित जियो


शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

क्या सच है क्या झूठ



क्या सच है क्या झूठ
सब नेता-राजतंत्री हैं मूक
राष्ट्र-गौरव को पहुँची है ठेंस
जाने कौन ने किया कलेस
इक ओर गणतंत्र की रम्य झांकी थी
दूजी ओर पत्थर व लाठी थी
लाल किले पर ज्यूँ फ़हराया मज़हबी ध्वज
माँ भारती ने त्युँ निज ताज दिया तज
सिपाही चतुर्दिक कर रहा संघर्ष था
बाहुबली अप्लापियों ने किया विध्वंस था

आंदोलन नहीं है यह
मर्यादा लांघी है
मज़दूर किसान के भेस में
कुछ उपद्रवी उत्पाती हैं
दंगे से क्या पूरी होगी मांग?
शांति छोड़ जो रचा यह स्वाँग
कैसे हो जय जवान जय किसान?
जब तिरंगे का हुआ विश्व-भर अपमान
दुःख है, किसानों का अहित हुआ
जो हुआ अनुचित अनिष्ट हुआ
जो हुआ अनुचित अनिष्ट हुआ

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

अख़बार



अख़बार में ख़बर आई
एक बस पुल से नीचे गिरी, 29 की मौत 50 घायल
ये ख़बर मेरे लिए सिर्फ़ एक ख़बर ही थी
जो पढ़ भी लिया और नहीं भी, 
बस ऐसा कुछ
होता है ना ! आदतन यूँ ही...हम अख़बार के पन्ने पलटते हैं और
कुछ छोटी कुछ बड़ी ख़बर पढ़ते हैं
वो हमारे लिए महज़ एक 'पीस ऑफ इन्फॉर्मेशन' होती है
मगर इस बार ये ख़बर घर कर गई
जब पता चला इस हादसे में कोई अपना भी था
मानो या ना मानो, एक ख़बर होती है
महज़ स्याही से लिखे हुए कुछ अक्षर, कुछ शब्द
पर वही ख़बर बन जाती है संवेदनाओं का, भावनाओं का स्त्रोत
जब निकल जाते हैं उससे ताल्लुक़ात,
दूर के ही सही
अबके बार ये ख़बर हफ़्ते भर रही मेरे साथ
शायद कुछ और दिन ठहरती ग़र रिश्ता और क़रीबी होता
लेकिन 
फ़िर भी ज़िंदगी की अख़बार के सफ़हे पलटने तो थे
वही कुछ छोटी कुछ मोटी ख़बर
कुछ बड़ी कुछ तगड़ी ख़बर
जो पढ़ लिये और नहीं भी
जो सुन लिये और नहीं भी

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

ख़ुमारी



ख़ुमारी...
ख़ुमारी पुरानी तस्वीरों की
ख़ुमारी पुराने लम्हातों की
ख़ुमारी पुराने रिश्तों की
ख़ुमारी पुराने जज़्बातों की
ये ख़ुमारी अच्छी है
तब तक जब तक 
किसी बीमारी में न तबदील हो जाये

ख़ुमारी में रहो इस वक़्त की
ख़ुमारी में रहो मुसाफ़िर-ए-सम्त की
ख़ुमारी में रहो अपनों के उल्फ़त की
ख़ुमारी में रहो बू-ए-मोहब्बत की
इस ख़ुमारी में डूबे रहो 
तब तक जब तक
ये ज़िन्दगी ख़ुदा के हाथों ज़ब्त न हो जाये 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो

कब तक सुनोगे दूसरों की
कभी अपने दिल की सुन के तो देखो
क्या हुआ गर नहीं है कोई रहबर तुम्हारा
ख़ुद पर यकीन कर रहगुज़र ढूंढ के तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


दुनिया बड़ी ही हसीन है
कभी प्यार से बाहें फैला कर तो देखो
सब के दिलों पर राज करोगे
नकाबपोश चेहरे से नकाब हटाकर तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


क्या हुआ गर सारे सुर पक्के नहीं तुम्हारे
कभी कोई साज़ छेड़कर तो देखो
क्या पता नायाब नगीना हाथ लग जाए तुम्हारे
कभी यूँ ही सैर पर निकल कर तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


ज़हर घोलने वाले बहुतेरे हैं इस जहाँ में
कभी मीठे बोल की चासनी घोल के तो देखो
सब के सब दिल दुखाने में माहिर हैं
कभी किसी के ज़ख्म पर मरहम लगा के तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


नहीं होते हर किसी के पिचहत्तर आशिक
किसी के दिल के कोरे पन्नों पर दस्तखत कर के तो देखो
ताउम्र रहेंगे तुम्हारे शुक्रगुज़ार
कभी किसी की ज़िन्दगी बयाबान से बागबान कर के तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो


अब न जियोगे हिज्र में तुम, जल्द आएगी वस्ल की रात
इश्क़-ए-हयात में सरगम एक बार फिर गुनगुना के तो देखो
और न करना पड़ेगा इंतज़ार ए मुन्तज़िर
ताक़-ए-दिल में किसी और का चेहरा बसाकर तो देखो
ज़िन्दगी की धुन बदल के तो देखो

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम



यही तुम्हारा सत्य है जो मान लो तुम 
तुम्हें खुद से क्या चाहिये, जो ये जान लो तुम
किन बुलंदियों को छू लोगे इसका तुम्हें अंदाज़ा नहीं
इन बेड़ियों को अगर तोड़ दो तुम
चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम 

अकेले में अगर नंगा हो सको तुम
तन-मन के काले दाग जो देख सको तुम 
छुपना- छुपाना, उघारना-ढांपना से दूर
नग्नता में अपनी सच्चाई जो देख सको तुम
चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम 

किसी की न सुनकर जो दिल की सुनो तुम 
कोई गुरु, कोई संत नहीं 
सबकी छोड़ जो अपनी करो तुम 
सारे जग से भले बैरी हो जाओ तुम 
पर जो खुद के सच्चे दोस्त बन सको तुम 
चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम 

हालातों के मारे तो बहुतेरे हैं 
परिस्थितियों के विरुद्ध जो डटकर लड़ सको तुम 
हर किसी का रास्ता साफ नहीं होता 
भटक कर ही सही, मंज़िल तक का पथ जो ढूंढ सको तुम 
चलो उठो, बनो विजयी हार ना मानो तुम 

रविवार, 13 दिसंबर 2020

खुशी है एक मृगतृष्णा


कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है
हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं
क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए
जो है उसकी सुद नहीं, जो अक्षुण्ण निकल पड़े उसकी तलाश में
खुशी है एक मृगतृष्णा

जिस्म तो पास हैं, रूह में कोसों की दूरी
ऐसे क्यूँ जुदा-जुदा, कैसी है मजबूरी
कहते हैं प्यार है, पर जताते हैं नहीं
माना ये एहसास का मामला है, हम अपनी ज़ुबाँ से कभी कहते क्यूँ नहीं
जब इंसान गुज़र जाता है, हम रोते हैं पछताते हैं 
काश और शायद की लड़ाई फिज़ूल में लड़ते हैं 
खुशी है एक मृगतृष्णा

ये कैसी कैफ़ियत, ये कैसा जुनून 
सब भाग रहे हैं बेतहाशा ज़िन्दगी की दौड़ में
क्या चाहिए ज़िंदगी से
कभी एक पल भी नहीं पड़े सोच में
खुशी है एक मृगतृष्णा

कोई बड़ी गाड़ी में बैठ कर रो रहा
कोई सड़कों पर गुलाब बेचकर ही मुस्कुरा रहा 
कोई बड़े बंगले में भी बेचैन 
कोई फुटपाथ पर ही सुकून की नींद सो रहा
खुशी है एक मृगतृष्णा

कहते हैं ये ज़हनियत की बात है 
कोई है सदाबहार, किसी के दफ़्न तमाम जज़्बात हैं 
कोई बेख़ौफ़ ज़िन्दगी जी रहा, किसी के संगीन मामलात हैं 
ज़िन्दगी को यूँ ज़ाया न किजिये हुज़ूर 
जी हाँ, मज़ा लीजिए वरना कब कफ़न उढ़ा दिए जाओगे, महज़ कुछ वक़्त की बात है 
खुशी है एक मृगतृष्णा

तो क्या बात थी


समुंदर की गहराई, या आसमान की ऊंचाई
हो सुदृढ़ जो भेद पाते तो क्या बात थी 
मिले सफलता की रोशनाइ, या हो जाए भले जग हँसाई
जो निडर हो आगे बढ़ पाते तो क्या बात थी 

शायरों की रुबाई, या कवियों की कविताइ 
जो भली-भाँति जान पाते तो क्या बात थी
रेगिस्तान की चिलचिलाती गर्मी, या कपकपाती ठंड पहाड़ों की
वीर जवानों की तरह जो हम भी बर्दास्त कर पाते तो क्या बात थी 

बाबूजी की दी हुई घड़ी, या माँ के हाथों स्वेटर की बुनाई 
जो ऑनलाइन शॉपिंग की जगह ले पाती तो क्या बात थी
बेटों की आबदाने की तलाश में प्रियजनों से लंबी जुदाई 
या बेटियों की बाकी उम्र के लिए घरों से विदाई
जो ऐसी रवायत चलन में न होती तो क्या बात थी

शहर में गाँव-सी शुद्ध हवा चले पुरवाई और 
गाँव में शहरों-सा घर-घर हो बच्चों की शिक्षा और रोगियों की दवाई 
जो ये सपना साकार होने पाए तो क्या बात थी 
अभिनेता गर करे अभिनय ये न सोचकर कि करेगी फ़िल्म करोड़ों की कमाई
और जवानों की शहादत पे न हो राजनैतिक रोटियों की सिकाई 
जो यह भारतवर्ष का भविष्य होने पाए तो क्या बात थी 

खुशी है एक मृगतृष्णा

कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए जो है उसकी सुद नहीं, जो...