छाया सघन घोर तमस
स्त्री-जीवन हर ओर पीड़ित
चोटिल देह प्राण कुपित
न कोई सुनवाई, न कोई पेशी
फिर रही वो लिए
टूटी रीढ़ व जीभ कटी
फेंक दी जाती सरेआम अधनंगी लाश
न हो रहा दोषियों को कारावास
नाकामी छुपा ली खाकी ने अपनी
करके बच्ची का जबर संस्कार
पर बेहद दुःखद है ख़त्म न हो रहा
उद्दंड पुरुष का यह विकार
दोहराया जा रहा अलबत्ता फिर वही एक बार
लिख रहे कवि छंद और उत्कृष्ट अलंकार
कड़ी निंदा से भर गए अख़बार
सोशल मीडिया पर लग गया हैशटैग का अंबार
होगी न्यूज़रूम से खोखली हुंकार
'हैंग द रेपिस्ट्स' की लगेगी निष्फल गुहार
कानून-व्यवस्था कटघरे में होगी फिर एक बार
होगा तर्क-वितर्क, मीमांसा, सत्य-असत्य पर विचार
सब सो जाएंगे पुनः कुम्भकर्ण की नींद
तब तक जब तक फिर न ऐसा कुछ घटे
किसी का सर न कटे, किसी का माथा न फटे
सब हो जाएगा सामान्य यूँ ही हर बार
सिलसिलेवार लगातार बारंबार
