"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली

शुक्रवार, 7 मई 2021

दंगा

 


जब कोई दंगा होता है
तो कहर बरपता है
अनगिनत मौतें होती हैं
ज़िंदगियाँ पायमाल हो जाती हैं
और उन सारी मौतों का हिसाब
महज़ आँकड़ों से नहीं लगाया जा सकता
मेरे तुम्हारे लिए होगी एक सुर्खी
या सुर्खियों में बताई गई सिर्फ़ एक संख्या

ज़रा उन मांओं से पूछो जिनकी गोद उजड़ गई
वो दर्द मिला जिसकी कोई दवा नहीं
उन दुल्हनों से पूछो जिनके दूल्हे शादी की अगली सुबह ही 
मौत की गहरी नींद में सो गए
हाथों की मेंहदी देख रो-रोकर होती है रात,
होता है दिन
उन मासूम बच्चों से पूछो जिनके सर से बाप का साया छिन गया
तमाम उम्र के लिये उनके हिस्से पिता-प्रेम नहीं आ पाया

हुक्मरानों को नहीं मालूम "दंगों की पीड़" क्या होती है
किसी अपने की मौत का ग़म क्या होता है
एक ग़लत हुक्म नहीं लिखते सिर्फ़
साथ ही एक तबाही का फ़रमान भी ज़ारी कर दिया जाता है
बहुत भारी तबाही
हर जली-टूटी दीवार चीख-चीखकर इस बात का
सबूत दे रही होती है
के उस रात क्या गुज़री

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