"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली
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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

त्रासदी



आग लगी, भगदड़ मची, शोर हुआ
सब एक-दूसरे को धक्का दे भागने लगे आयें-बांयें
सारे उस धधकती आग के डर से चीखने-पुकारने लगे
कुछ तो आनन-फानन में खिड़की से ही कूदने लगे
तो कुछ उस जानलेवा आग की लपटों में झुलसने लगे
और अंततः मौत की भेंट चढ़ गए
जब कोई आपदा आती है तब बुद्धि किसकी काम करती है भला
और दूसरे लोग तो बस तमाशबीन
स्मार्टफोन निकाला और लगे वीडियो बनाने
सारी मानसिकता व नैतिकता रख दी है ताख पर
जाने कौन-सी आग की लपटों का शिकार हो गई है मनुष्यता
बहुत भारी त्रासदी है ये हमारी 'टेक-सैवी' पीढ़ी का
मानो या ना मानो!!!

खुशी है एक मृगतृष्णा

कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए जो है उसकी सुद नहीं, जो...