"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली
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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

मसान की भट्ठी

 

मौत आई तो किसी की एक न चली
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम,
सबकी जान पर बनी
अस्थि-पंजर सब राख हो गए
कि चिता जल कर ख़ाक हो गई
गिर रहीं अनगिनत लाशें रोज़ाना
कैसी जानलेवा ये आग फैल गई

मसान की भट्ठी भी नहीं है शांत
न तो क़ब्र की खुदाई ही रुक रही
रुदन-क्रंदन के स्वर हैं कानों में पहरों-पहर गूँजते
ये बेहिसाब मौतें बस 
झूठे आँकड़ों में सिमट कर रह गईं

ये क़ौमी "जुलूस-ताजिये" निकालना छोड़ दो
के मौत मज़हब नहीं देखती
एक दूसरे की बस ख़ैर मांगो
के ज़िन्दगी में और बड़ी तलब नहीं होती
जो बन सको तो एक-दूजे का "ऑक्सीजन" बनो
ज़हर तो हवा में भी घुल चुकी है
इसकी हरगिज़ कमी नहीं

सरकारों का क्या, आयेंगी जायेंगी
कुर्सी ही उनका सर्वस्व है,
वो तो उसे ही बचायेगी
तुम अपनी मांगें सही रखो
"मंदिर-मस्जिद" काफ़ी हैं,
पाठशाला-अस्पताल मांगो
ऊपरवाला खूब महफ़ूज़ है,
तुम अपनी ख़ैर तो सोचो

प्रजा सबल बनो जो गद्दी का ख़ौफ़ न करे
प्रजा सजग  बनो जो अपनी मांग सही रखे
वरना
"राजा राम" नहीं जो बिन कहे कष्ट हर लें
"राजा राम" नहीं जो बिन कहे कष्ट हर लें

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

इन्क़िलाब


चेहरे पे ओढ़े रखता हूँ चादर शीरीन मुस्कान की
जो दिल की लिखूँगा तो इन्क़िलाब लिखूँगा

ख़ामोशी का ही पहरा रहता है मेरे ज़हन में अक़्सर

पन्नों पर फटूँगा तो सैलाब लिखूँगा

दुनियां की इस मोह-माया से यूँ तो परे हूँ

ग़र जो बन पाया तो अपने महबूब का इंतिख़ाब बनूँगा

हक़ीक़त में ही जीना पसंद है मुझे पर

कल कैसा हो जो कोई पूछे तो मैं अपना ख़्वाब लिखूँगा

तुम दुश्मन भले हो मेरे, लाख नफ़रत सही

किसी गली,किसी चौक पर मिले तो मैं तुम्हें गुलाब दूँगा

हर ग़ज़ल हर नज़्म वतन के नाम करूँ मैं
जहाँ कहीं भी रहूँ, मैं अपनी मिट्टी से प्यार बेहिसाब करूँगा

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

निज़ाम

चंद ही निज़ाम हैं यहाँ
वरना हर कोई किसी न किसी का ग़ुलाम है यहाँ

यूँ तो सबकी ज़िंदगी में कुछ न कुछ ख़ास है
पर किसी किसी की चर्चा-ए-आम है यहाँ

रक़बत की अंधी दौड़ में रंजिश ही पालते हैं लोग
एक दूसरे का यहाँ एहतराम कहाँ

मार-काट, लूट-पाट मची है चारों तरफ़ हरसू
सरकार कोई भी आए जाए, इन विकृतियों पर विराम कहाँ

सरस्वती और लक्ष्मी की लड़ाई में लक्ष्मी ही जीत रही है सदा
ज्ञान-चक्षु  जन्म-जन्मांतर से बंद, 
फिर भी ख़ुद को हर कोई महाज्ञानी समझता है यहाँ

इंसान भी कैसा जीव है, मंगल पर जीवन का अंश ढूँढता है
पृथ्वी पर पंचतत्व होते हुए भी मची है त्राहि-त्राहि, 
इसका किसी को संज्ञान कहाँ

खुशी है एक मृगतृष्णा

कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए जो है उसकी सुद नहीं, जो...