"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली
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शुक्रवार, 21 मई 2021

आदत हो जाने की आदत

 


इंसानों की एक खराब आदत है
हर चीज़ की आदत हो जाना
कुछ ठीक-ठाक वक़्त बीतने के बाद
एक चीज़ के साथ
चाहे वो एक स्थिति-परिस्थिति हो
या कम-ज़्यादा समय तक साथ रहने वाले इंसान हों
या फ़िर जीवन के अन्य छोटे-बड़े परिवर्तन
इंसान उसके साथ जीने का आदी हो जाता है
अब नहीं तो तब

यह सही भी है,
पर 
कुछ मौकों पर
यह उसे जीने का हौसला देती है
प्रतिकूल समय में

लेकिन,
जब बदतर से बदतरीन स्थिति हो चारों ओर
हलाहल के कड़वे घूँट पी रहे हों लोग
और मौत के घाट उतर रहे हों
तो 
आदमी ज़रा अपनी इस
"किसी भी चीज़ की आदत हो जाने की आदत" 
से परहेज़ करे

लाशों के साथ जीने का भी कहीं आदी न हो जाये
कहीं भाव-शून्य न हो जाय
और 
अपनी ज़िंदगी उसी बेपरवाही-बेफ़िक्री में 
उन्मत्त होकर न जिये
के जैसे सब सामान्य ही हो

जब दूसरे 
एक कुचक्र 
में फंसकर दम तोड़ रहे हों
तो "नैतिकता" तो यह है कि
मानस उनका मर्म जाने
अपनी आँखें आर्द्र करे
ऐसे जटिल समस्या का शीघ्र निदान हो,
ईश्वर से प्रार्थना करे
अपनी गति थोड़ी धीमी करे
और अपने हाथ-पैर समेट कर जिये

करुणा पैदा करे और
जीवित लोगों के काम आए 
दुखियारों का कष्ट हरे
उनके लिये एक उम्मीद की किरण बने
ठिठकते जीवन में चंद साँसें और जोड़े
कुछ अपनी कहे, ज़्यादा उनकी सुने
थोड़ा और मनुष्य बने
थोड़ा और मनुष्य बने

शुक्रवार, 7 मई 2021

दंगा

 


जब कोई दंगा होता है
तो कहर बरपता है
अनगिनत मौतें होती हैं
ज़िंदगियाँ पायमाल हो जाती हैं
और उन सारी मौतों का हिसाब
महज़ आँकड़ों से नहीं लगाया जा सकता
मेरे तुम्हारे लिए होगी एक सुर्खी
या सुर्खियों में बताई गई सिर्फ़ एक संख्या

ज़रा उन मांओं से पूछो जिनकी गोद उजड़ गई
वो दर्द मिला जिसकी कोई दवा नहीं
उन दुल्हनों से पूछो जिनके दूल्हे शादी की अगली सुबह ही 
मौत की गहरी नींद में सो गए
हाथों की मेंहदी देख रो-रोकर होती है रात,
होता है दिन
उन मासूम बच्चों से पूछो जिनके सर से बाप का साया छिन गया
तमाम उम्र के लिये उनके हिस्से पिता-प्रेम नहीं आ पाया

हुक्मरानों को नहीं मालूम "दंगों की पीड़" क्या होती है
किसी अपने की मौत का ग़म क्या होता है
एक ग़लत हुक्म नहीं लिखते सिर्फ़
साथ ही एक तबाही का फ़रमान भी ज़ारी कर दिया जाता है
बहुत भारी तबाही
हर जली-टूटी दीवार चीख-चीखकर इस बात का
सबूत दे रही होती है
के उस रात क्या गुज़री

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

मसान की भट्ठी

 

मौत आई तो किसी की एक न चली
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम,
सबकी जान पर बनी
अस्थि-पंजर सब राख हो गए
कि चिता जल कर ख़ाक हो गई
गिर रहीं अनगिनत लाशें रोज़ाना
कैसी जानलेवा ये आग फैल गई

मसान की भट्ठी भी नहीं है शांत
न तो क़ब्र की खुदाई ही रुक रही
रुदन-क्रंदन के स्वर हैं कानों में पहरों-पहर गूँजते
ये बेहिसाब मौतें बस 
झूठे आँकड़ों में सिमट कर रह गईं

ये क़ौमी "जुलूस-ताजिये" निकालना छोड़ दो
के मौत मज़हब नहीं देखती
एक दूसरे की बस ख़ैर मांगो
के ज़िन्दगी में और बड़ी तलब नहीं होती
जो बन सको तो एक-दूजे का "ऑक्सीजन" बनो
ज़हर तो हवा में भी घुल चुकी है
इसकी हरगिज़ कमी नहीं

सरकारों का क्या, आयेंगी जायेंगी
कुर्सी ही उनका सर्वस्व है,
वो तो उसे ही बचायेगी
तुम अपनी मांगें सही रखो
"मंदिर-मस्जिद" काफ़ी हैं,
पाठशाला-अस्पताल मांगो
ऊपरवाला खूब महफ़ूज़ है,
तुम अपनी ख़ैर तो सोचो

प्रजा सबल बनो जो गद्दी का ख़ौफ़ न करे
प्रजा सजग  बनो जो अपनी मांग सही रखे
वरना
"राजा राम" नहीं जो बिन कहे कष्ट हर लें
"राजा राम" नहीं जो बिन कहे कष्ट हर लें

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

त्रासदी



आग लगी, भगदड़ मची, शोर हुआ
सब एक-दूसरे को धक्का दे भागने लगे आयें-बांयें
सारे उस धधकती आग के डर से चीखने-पुकारने लगे
कुछ तो आनन-फानन में खिड़की से ही कूदने लगे
तो कुछ उस जानलेवा आग की लपटों में झुलसने लगे
और अंततः मौत की भेंट चढ़ गए
जब कोई आपदा आती है तब बुद्धि किसकी काम करती है भला
और दूसरे लोग तो बस तमाशबीन
स्मार्टफोन निकाला और लगे वीडियो बनाने
सारी मानसिकता व नैतिकता रख दी है ताख पर
जाने कौन-सी आग की लपटों का शिकार हो गई है मनुष्यता
बहुत भारी त्रासदी है ये हमारी 'टेक-सैवी' पीढ़ी का
मानो या ना मानो!!!

खुशी है एक मृगतृष्णा

कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए जो है उसकी सुद नहीं, जो...