"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली

शुक्रवार, 14 मई 2021

प्रकृति का कर्ज़



खरीदा हुआ दाना
खरीदा हुआ पानी
खरीदा हुआ अनल-अनिल
खरीदी हुई धरणी

 
इस उधार की ज़िंदगी में
बड़ी खरीदारी कर ली हमने
इस भ्रम में कि
प्रकृति के कर्ज़ से उऋण हो जाएंगे


मगर इस संभ्रम में
सभी वित्तीय कोष 
या तो खाली हो गये या
खाली होने के कगार पर हैं
और
हम कर्ज़दार के कर्ज़दार रह गये

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

खुशी है एक मृगतृष्णा

कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए जो है उसकी सुद नहीं, जो...