"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली
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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

सच की तलाश



निकला हूँ सच की तलाश में मैं
इक दिन सवेरा होगा, हूँ बस इसकी आस में मैं
क्या बताऊँ क्या-क्या घट रहा रोज़ाना?
उठती है भीतर इक टीस
होता हूँ यह सब देख बहुत उदास-सा मैं

यूँ तो टुकड़ों-सा बिखर जाऊँ पर
ये जो हलाहल है फैला हुआ, यत्र तत्र सर्वत्र
नष्ट हो जाएगा
जोड़े रखता हूँ ख़ुद को इसी विश्वास से मैं

जाने कितने बहरूपियों से होती है भेंट
उनके पाखंड की अनुभूति होते हुए भी,
करता हूँ उनको सहृदय स्वीकार मैं
यूँ के मैं ही नहीं हूँ सच का पुतला,
मैं ही नहीं हूँ अकेला रोशनी का चिराग़
और ना ही इस पापी और विषैली दुनिया के
अंधेरे का नाश करने में सक्षम हूँ मैं
पर क्या करूँ?
ग़ुबार आख़िर किस हद तक अंदर रखूँ मैं

नहीं होगी दिनकर-सी क्रांति मेरी कविताओं में
पर कलम की ताक़त पे थोड़ा तो विश्वास रखता हूँ मैं
आज जब हम चाँद की सतह तक अनुसंधान को चले हैं
भू-मंडल के अस्तित्व पर जो प्रश्न-चिन्ह लगा है
उसके उत्तर की तलाश में हूँ मैं
हाँ! निकला हूँ सच की तलाश में मैं
इक दिन सवेरा होगा, हूँ बस इसकी आस में मैं

खुशी है एक मृगतृष्णा

कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए जो है उसकी सुद नहीं, जो...