"हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना हो, कई बार देखना" ~ निदा फ़ाज़ली
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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

मसान की भट्ठी

 

मौत आई तो किसी की एक न चली
क्या हिन्दू क्या मुस्लिम,
सबकी जान पर बनी
अस्थि-पंजर सब राख हो गए
कि चिता जल कर ख़ाक हो गई
गिर रहीं अनगिनत लाशें रोज़ाना
कैसी जानलेवा ये आग फैल गई

मसान की भट्ठी भी नहीं है शांत
न तो क़ब्र की खुदाई ही रुक रही
रुदन-क्रंदन के स्वर हैं कानों में पहरों-पहर गूँजते
ये बेहिसाब मौतें बस 
झूठे आँकड़ों में सिमट कर रह गईं

ये क़ौमी "जुलूस-ताजिये" निकालना छोड़ दो
के मौत मज़हब नहीं देखती
एक दूसरे की बस ख़ैर मांगो
के ज़िन्दगी में और बड़ी तलब नहीं होती
जो बन सको तो एक-दूजे का "ऑक्सीजन" बनो
ज़हर तो हवा में भी घुल चुकी है
इसकी हरगिज़ कमी नहीं

सरकारों का क्या, आयेंगी जायेंगी
कुर्सी ही उनका सर्वस्व है,
वो तो उसे ही बचायेगी
तुम अपनी मांगें सही रखो
"मंदिर-मस्जिद" काफ़ी हैं,
पाठशाला-अस्पताल मांगो
ऊपरवाला खूब महफ़ूज़ है,
तुम अपनी ख़ैर तो सोचो

प्रजा सबल बनो जो गद्दी का ख़ौफ़ न करे
प्रजा सजग  बनो जो अपनी मांग सही रखे
वरना
"राजा राम" नहीं जो बिन कहे कष्ट हर लें
"राजा राम" नहीं जो बिन कहे कष्ट हर लें

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

कठपुतली



इंसान यूँ तो है ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना
पर है उसे व्यर्थ ही समय नष्ट करना
अपने भवितव्य से अनजान
रहे सदा व्याकुल, न पावे त्राण

करके जल्द सारे पड़ावों को पार
शीघ्र ही करना उसे भवसागर पार
हड़बड़ी में जाता जीना भूल
फ़िर वैकुंठ की तैयारी में रहता मशगूल

एक बित्ता जमीन हथियाने पापी जाल बुने
अंततः सब पीछे छोड़ खाली हाथ चले
वह मूढ़, तनिक ये न समझे
पृथ्वी जीतने बड़े-बड़े तुर्रमखां आये
पृथ्वी वहीं है, वे अतुल व्योम में चले गये

शांति हेतु परिजन को दूर-सुदूर करे
अशांत ही परलोक की ओर कूच करे
जीवन-भर जिस निजता का पाठ पढ़ें
वही निज-जन खड़ी उनकी खाट करें

सुख-साधन के पीछे सारा जीवन खपाय
अंततः माटी का शरीर माटी में मिल जाय
कुछ बनने की ज़िद में सारी उमर बिताय
रहेगा कठपुतली ही, न हो कदाचित् व्यग्र हाय!

कौन समझाए? ये संसार है तो बस
ईश्वर की रचनात्मकता का नमूना, जैसे
मैं लिखूँ कविता, तुम बनाओ कलाकृतियाँ
बढ़ई बनाये फर्नीचर, कुम्हार बनाये मूर्तियाँ
ठीक वैसे, है विधाता ने ये संसार बनाया
अपनी सृजनात्मकता का है मिसाल दिया

इस दुनिया का और कोई गूढ़ रहस्य नहीं
तुम्हारे आने का कोई विशेष उपलक्ष्य नहीं
सफल हो या निष्फल रहो
तुम तो बस सद्कर्म करो

चार दिन की है ज़िन्दगी
अनंत असीम अपरिमित जियो
मुकुलित मुदित तरंगित जियो
मुकुलित मुदित तरंगित जियो


शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

ख़ुमारी



ख़ुमारी...
ख़ुमारी पुरानी तस्वीरों की
ख़ुमारी पुराने लम्हातों की
ख़ुमारी पुराने रिश्तों की
ख़ुमारी पुराने जज़्बातों की
ये ख़ुमारी अच्छी है
तब तक जब तक 
किसी बीमारी में न तबदील हो जाये

ख़ुमारी में रहो इस वक़्त की
ख़ुमारी में रहो मुसाफ़िर-ए-सम्त की
ख़ुमारी में रहो अपनों के उल्फ़त की
ख़ुमारी में रहो बू-ए-मोहब्बत की
इस ख़ुमारी में डूबे रहो 
तब तक जब तक
ये ज़िन्दगी ख़ुदा के हाथों ज़ब्त न हो जाये 

खुशी है एक मृगतृष्णा

कभी किसी चेहरे को गौर से देखा है हर मुस्कुराहट के पीछे ग़म हज़ार हैं क्या खोया क्या पाया, हैं इसके हिसाब में लगे हुए जो है उसकी सुद नहीं, जो...