इंसान तरक्की कर रहा है
आधुनिक युग का इंसान खूब तरक्की कर रहा है
दिन दुगुनी रात चौगुनी कर रहा है
हो भी क्यूँ न!
उन्नत प्रौद्योगिकी युग है
घंटों का काम मिनटों में संभव है
अभियांत्रिकी की देन है यह अद्भुत क्रांति
पैसा इफ़रात है,
और अर्जित करने में लगा हुआ है आदमी
मंहगाई जो सीमाएं लांघ रही है
पर धनोपार्जन की इस अंधी दौड़ में
ये इंसान अत्यंत खालीपन व रिक्तता से गुज़र रहा है
भावनाओं का खालीपन और रिश्तों में रिक्तता
इंसान यहाँ भी अप्रतीम तरक्की कर रहा है
दिन दुगुनी रात चौगुनी कर रहा है
समझ नहीं आता!
मंहगाई जो सीमाएं लांघ रही है
पर धनोपार्जन की इस अंधी दौड़ में
ये इंसान अत्यंत खालीपन व रिक्तता से गुज़र रहा है
भावनाओं का खालीपन और रिश्तों में रिक्तता
इंसान यहाँ भी अप्रतीम तरक्की कर रहा है
दिन दुगुनी रात चौगुनी कर रहा है
समझ नहीं आता!
इसे इंसान का उत्थान कहें या पतन?




